!!भारतीय ज्ञान परंपरा में अलंकार विमर्श!!


साहित्य शास्त्र में अलंकार शब्द का प्रयोग आभूषण के अर्थ में , सौंदर्य के अर्थ में किया जाता है। जैसा कि अमर सिंह ने अमरकोश में वर्णन किया -"(अलंकारस्तु आभरणं परिष्कार विभूषणम्)"।

अलंकार यह शब्द "अलम" इस उपपद के रहते "कृधातु" से "घञ"प्रत्यय करके अलंकार शब्द की निष्पत्ति होती है। अलंकार का लक्षण आचार्य भामह करते हैं,"(काव्यशोभा कराधर्मविषेशाः अलङ्कारः)"।

आचार्य दंडी लक्षण इस प्रकार करते हैं"(काव्यशोभा करान् धर्मान् अलङ्कारः प्रचक्षते)"।

प्राचीन काव्य तत्व मीमांसको  के मत में काव्य में अलंकार की महती उपयोगिता प्रतिपादित की गई है। जैसा जयदेव भी मानते हैं कि काव्य में अलंकार का होना अत्यावश्यक है,चाहे वह व्यक्त हो अथवा अभिव्यक्त रूप में ही क्यों न हो।

अलंकार का लक्षण देते हुए जयदेव कहते हैं-

"अङ्गीकरोति यः काव्यम् शब्दार्थ अनलङ्कृति

असौ न मन्यते कस्मात् अनुष्णमनलङ्कृति"।।

 

जयदेव  के इस वचन से यह प्रमाणित होता है कि काव्य में अलंकारों की उपयोगिता होती ही है। अलंकार शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार आचार्य करते हैं- "अलङ्करोति अलङ्कारः" "अलंक्रियते अनेन अलङ्कारः"।अलङ्कार का महत्व प्रतिपादित करते हुए भामह कहते है - "न कान्तमपि निर्भूषम् विभाति वनिताननम्"अर्थात् जिस  प्रकार से अनेक गुणों से  समन्वित नायिका भी बिना आभूषण के शोभायमान नहीं होती, उसी प्रकार काव्य में शब्द और अर्थ स्वरूप गुणों के समन्वित होने पर भी बिना अलंकारों के काव्य में चमत्कार नहीं होता। कहने का आशय यह है कि काव्य में अलंकार का होना अत्यावश्यक माना जाता है। जिस प्रकार अलंकार अर्थात् आभूषण नायिका के सौंदर्य को बढ़ाते हैं, उसी प्रकार अलंकार काव्य की शोभा को बढ़ाते हैं। अग्नि पुराणकार अलंकार रहित काव्य की उपमा विधवा स्त्री से देते हुए कहते हैं-"अलङ्कार रहिता  विधवेव सरस्वती" अर्थात जिस प्रकार से विधवा स्त्री समाज में उच्च स्थान को प्राप्त नहीं करती,उसी प्रकार अलंकार रहित काव्य भी समाज में अति उच्च स्थान को प्राप्त नहीं करता।

आचार्य मम्मट अनुसार अलंकार का लक्षण-

"उपकुर्वन्ति तं सन्तं येङ्गद्वारेण जातुचित्

हारादिवदलङ्काराः तेनुप्रासोपमादयः।।"

कविराज विश्वनाथ अलंकार का लक्षण-

"शब्दार्थयोः अस्थिरा ये धर्माः काव्य शोभातिशायिनः

रसादीनुपकुर्वन्तो अलंकारस्ते अङ्गदादिवत्"।।

 

!! अलङ्कारो का उद्भव एवं विकास!!

अलंकारों का सर्वप्रथम प्रयोग आचार्य भरत  ने अपने ग्रंथ नाट्यशास्त्र में किया है।आचार्य भरत ने मात्र चार ही अलंकारों को स्वीकार किया है-(यमक ,रूपक ,उपमा और दीपक)। अग्नि पुराणकार ने 15 अलंकार स्वीकार किए हैं।आचार्य वामन अपने काव्यालंकारसूत्र में 33 अलंकारों का विवेचन करते हैं ।आचार्य भामह काव्यालंकार में 39 अलंकारों का प्रतिपादन करते हैं।आचार्य मम्मट ने काव्यप्रकाश में 67 अलंकार स्वीकार कियेहैं। आचार्य विश्वनाथ ने 74 अलंकार माने हैं। जयदेव ने चंद्रलोक में 100 अलंकार स्वीकार किए हैं। इसी  क्रम में  कुवलयानंद ग्रंथ में अप्पयदीक्षित ने 120 अलंकारों का प्रयोग अत्यंत सूक्ष्मता के साथ किया है।  इस प्रकार  धीरे-धीरे संस्कृत ग्रंथों में अलंकारों की संख्या में दिन-प्रतिदिन वृद्धि देखने को मिल रही है ।वर्तमान में आचार्य अप्पयदीक्षित ने ही सबसे अधिक 120 अलंकारों को स्वीकार किया है ।

 

 

!! अलंकारों का विभाजन!!

शब्दार्थ की दृष्टि से अलंकारों के मुख्य तीन भेद आचार्य मम्मट स्वीकार  करते हैं।  1. शब्दालंकार,2. अर्थालंकार,3. उभयालंकार। शब्दालंकार के 6 भेद - (वक्रोक्ति ,अनुप्रास ,यमक, श्लेष ,चित्रालंकार पुनरुक्तवादभास )।अर्थालंकार के  61 भेद स्वीकार किया  है,जैसे (काव्यलिंगउपमेयोपमा,अनंन्वय,अतिशयोक्ति,दीपक विरोधाभास इत्यादि)।

 

 *उभयालंकार के अंतर्गत पुनरुक्तवदाभास की चर्चा की गई  है ।इस इस प्रकार आचार्य मम्मट ने अलंकारों का  विवेचन प्रस्तुत किया है।

!!अलङ्कार विषयक विभिन्न आचार्यो का मत!!

!!आचार्य भामह!!

आचार्य भामह कश्मीर के निवासी थे ।इनके पिता का नाम  रक्रिल था ।आचार्य भामह को अलंकार संप्रदाय का जनक स्वीकार  किया जाता है ।भामह का समय छठी शताब्दी का पूर्वार्ध माना जाता है ।आचार्य भामह अलंकार को काव्य का प्रमुख अंगस्वीकार  करते हैं ।भामह  ने 38 अलंकारों को स्वीकार किया है ,जिसमें दो शब्दालंकार, और 36 अर्थालंकार आते हैं। मुख्य रूप से इनके मत में वक्रोक्ति अलंकार प्रधान अलंकार है।

!!आचार्य दण्डी!!

आचार्य दण्डी अलंकार सम्प्रदाय के दूसरे प्रमुख आचार्य है।जिनका समय सातवीं शताब्दी  माना जाता है ।ये दक्षिण भारत के निवासी हैं।इनके ग्रंथ का नाम काव्यादर्श है।

आचार्य दंडी ने 39 अलंकारों को स्वीकार किया,जिसमें चार शब्दालंकार हैं   अनुप्रास, यमक ,चित्र ,और प्रहेलिका। ये अतिशयोक्ति अलंकार को पृथक रूप से देखते हैं। इनके मत में अतिशयोक्ति का एक अलग वैशिष्ट्य है।

 !!आचार्य रुद्रट!!

‌आचार्य रूद्रट कश्मीर के निवासी थे । जिन का समय नौवीं शताब्दी का पूर्वार्ध माना जाता है। इनके ग्रंथ का नाम काव्यादर्श है ।जिसमें  16 अध्याय 74 श्लोक हैं ।जो अलंकार संप्रदाय का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। आचार्य रुद्रट ने ही सर्वप्रथम अलंकारों का वैज्ञानिक वर्गीकरण प्रस्तुत किया था। अर्थालंकार 4 वर्गो में प्रस्तुत किया है।इन्होंने क्रम से उनका नाम वास्तव, औपम्य, अतिशय और श्लेष माना है।

!!आचार्य उद्भट!!

आचार्य उद्भट  अलंकार से संबंधित आचार्य हैं,जिन का समय आठवीं शताब्दी का उत्तरार्ध माना जाता है। इन्होंने "अलंकारसारसंग्रह "नामक ग्रंथ की रचना की, जो कि अलंकार के लिए अति महत्वपूर्ण है।उभट्ट ने अलंकारों में "समाहित" को स्वीकार किया,तथा नाट्य में "शांति रस"को भी स्थान दिया है।इन्होंने 41 अलंकारों को स्वीकार किया है और सभी अलंकारों में श्लेष को प्रधान रूप से स्वीकार करते हैं।

  !!आचार्य वामन !!

आचार्य वामन रीति सम्प्रदाय के आचार्य है।इनके ग्रंथ का नाम काव्यालंकारसूत्रवृति है।इन्होंने 32 अलंकारो का विवेचन किया है। इन्होंने व्याजोक्ति  नामक अलंकार की नवीन उद्भावना प्रस्तुत की है।वामन गुणों को काव्य का नित्य धर्म और अलंकार को काव्य का अनित्य धर्म स्वीकार करते हैं। वामन के अनुसार काव्य के शोभावर्धक गुण होते हैं उन गुणों मेंचमत्कृति लाने का कार्य अलंकार करते हैं, इस प्रकार से आचार्य वामन गुणों को ही काव्य में प्रधानता देते हैं, और अलंकार को गुणों से न्यून बताते हैं।

 

इस प्रकार भारतीय ज्ञान परंपरा में अलंकार के संदर्भ में अनेक आचार्यों का मत प्रस्तुत किया गया है ।अलंकार संप्रदाय के  प्रमुख आचार्यभामह को माना जाता है।जिन्होंने अलंकार संप्रदाय में एक अद्भुत ख्याति प्राप्त की है ।इन्हीं से अलंकार संप्रदाय की शुरुआत होती है,ऐसा आचार्यों का वक्तव्य है, जिस प्रकार बिना आभूषण के अत्यंत सुंदरी  युवती  भी शोभायमान नहीं होती, उसी प्रकार से बिना अलंकार के काव्य में उत्कृष्टता नहीं आती। इसलिए काव्य में अलंकार परम आवश्यक हैं,जिससे किसी भी कवि का काव्य समाज में उन्नत स्थान प्राप्त करें और और सहृदयों को आनंद देने वाला हो।

 

 

 

Tropical scene!!भारतीय ज्ञान परंपरा में अलंकार विमर्श!!

 

साहित्य शास्त्र में अलंकार शब्द का प्रयोग आभूषण के अर्थ में , सौंदर्य के अर्थ में किया जाता है। जैसा कि अमर सिंह ने अमरकोश में वर्णन किया -"(अलंकारस्तु आभरणं परिष्कार विभूषणम्)"।

अलंकार यह शब्द "अलम" इस उपपद के रहते "कृधातु" से "घञ"प्रत्यय करके अलंकार शब्द की निष्पत्ति होती है। अलंकार का लक्षण आचार्य भामह करते हैं,"(काव्यशोभा कराधर्मविषेशाः अलङ्कारः)"।

आचार्य दंडी लक्षण इस प्रकार करते हैं"(काव्यशोभा करान् धर्मान् अलङ्कारः प्रचक्षते)"।

प्राचीन काव्य तत्व मीमांसको  के मत में काव्य में अलंकार की महती उपयोगिता प्रतिपादित की गई है। जैसा जयदेव भी मानते हैं कि काव्य में अलंकार का होना अत्यावश्यक है,चाहे वह व्यक्त हो अथवा अभिव्यक्त रूप में ही क्यों न हो।

अलंकार का लक्षण देते हुए जयदेव कहते हैं-

"अङ्गीकरोति यः काव्यम् शब्दार्थ अनलङ्कृति

असौ न मन्यते कस्मात् अनुष्णमनलङ्कृति"।।

 

जयदेव  के इस वचन से यह प्रमाणित होता है कि काव्य में अलंकारों की उपयोगिता होती ही है। अलंकार शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार आचार्य करते हैं- "अलङ्करोति अलङ्कारः" "अलंक्रियते अनेन अलङ्कारः"।अलङ्कार का महत्व प्रतिपादित करते हुए भामह कहते है - "न कान्तमपि निर्भूषम् विभाति वनिताननम्"अर्थात् जिस  प्रकार से अनेक गुणों से  समन्वित नायिका भी बिना आभूषण के शोभायमान नहीं होती, उसी प्रकार काव्य में शब्द और अर्थ स्वरूप गुणों के समन्वित होने पर भी बिना अलंकारों के काव्य में चमत्कार नहीं होता। कहने का आशय यह है कि काव्य में अलंकार का होना अत्यावश्यक माना जाता है। जिस प्रकार अलंकार अर्थात् आभूषण नायिका के सौंदर्य को बढ़ाते हैं, उसी प्रकार अलंकार काव्य की शोभा को बढ़ाते हैं। अग्नि पुराणकार अलंकार रहित काव्य की उपमा विधवा स्त्री से देते हुए कहते हैं-"अलङ्कार रहिता  विधवेव सरस्वती" अर्थात जिस प्रकार से विधवा स्त्री समाज में उच्च स्थान को प्राप्त नहीं करती,उसी प्रकार अलंकार रहित काव्य भी समाज में अति उच्च स्थान को प्राप्त नहीं करता।

आचार्य मम्मट अनुसार अलंकार का लक्षण-

"उपकुर्वन्ति तं सन्तं येङ्गद्वारेण जातुचित्

हारादिवदलङ्काराः तेनुप्रासोपमादयः।।"

कविराज विश्वनाथ अलंकार का लक्षण-

"शब्दार्थयोः अस्थिरा ये धर्माः काव्य शोभातिशायिनः

रसादीनुपकुर्वन्तो अलंकारस्ते अङ्गदादिवत्"।।

 

!! अलङ्कारो का उद्भव एवं विकास!!

अलंकारों का सर्वप्रथम प्रयोग आचार्य भरत  ने अपने ग्रंथ नाट्यशास्त्र में किया है।आचार्य भरत ने मात्र चार ही अलंकारों को स्वीकार किया है-(यमक ,रूपक ,उपमा और दीपक)। अग्नि पुराणकार ने 15 अलंकार स्वीकार किए हैं।आचार्य वामन अपने काव्यालंकारसूत्र में 33 अलंकारों का विवेचन करते हैं ।आचार्य भामह काव्यालंकार में 39 अलंकारों का प्रतिपादन करते हैं।आचार्य मम्मट ने काव्यप्रकाश में 67 अलंकार स्वीकार कियेहैं। आचार्य विश्वनाथ ने 74 अलंकार माने हैं। जयदेव ने चंद्रलोक में 100 अलंकार स्वीकार किए हैं। इसी  क्रम में  कुवलयानंद ग्रंथ में अप्पयदीक्षित ने 120 अलंकारों का प्रयोग अत्यंत सूक्ष्मता के साथ किया है।  इस प्रकार  धीरे-धीरे संस्कृत ग्रंथों में अलंकारों की संख्या में दिन-प्रतिदिन वृद्धि देखने को मिल रही है ।वर्तमान में आचार्य अप्पयदीक्षित ने ही सबसे अधिक 120 अलंकारों को स्वीकार किया है ।

 

 

!! अलंकारों का विभाजन!!

शब्दार्थ की दृष्टि से अलंकारों के मुख्य तीन भेद आचार्य मम्मट स्वीकार  करते हैं।  1. शब्दालंकार,2. अर्थालंकार,3. उभयालंकार। शब्दालंकार के 6 भेद - (वक्रोक्ति ,अनुप्रास ,यमक, श्लेष ,चित्रालंकार पुनरुक्तवादभास )।अर्थालंकार के  61 भेद स्वीकार किया  है,जैसे (काव्यलिंगउपमेयोपमा,अनंन्वय,अतिशयोक्ति,दीपक विरोधाभास इत्यादि)।

 

 *उभयालंकार के अंतर्गत पुनरुक्तवदाभास की चर्चा की गई  है ।इस इस प्रकार आचार्य मम्मट ने अलंकारों का  विवेचन प्रस्तुत किया है।

!!अलङ्कार विषयक विभिन्न आचार्यो का मत!!

!!आचार्य भामह!!

आचार्य भामह कश्मीर के निवासी थे ।इनके पिता का नाम  रक्रिल था ।आचार्य भामह को अलंकार संप्रदाय का जनक स्वीकार  किया जाता है ।भामह का समय छठी शताब्दी का पूर्वार्ध माना जाता है ।आचार्य भामह अलंकार को काव्य का प्रमुख अंगस्वीकार  करते हैं ।भामह  ने 38 अलंकारों को स्वीकार किया है ,जिसमें दो शब्दालंकार, और 36 अर्थालंकार आते हैं। मुख्य रूप से इनके मत में वक्रोक्ति अलंकार प्रधान अलंकार है।

!!आचार्य दण्डी!!

आचार्य दण्डी अलंकार सम्प्रदाय के दूसरे प्रमुख आचार्य है।जिनका समय सातवीं शताब्दी  माना जाता है ।ये दक्षिण भारत के निवासी हैं।इनके ग्रंथ का नाम काव्यादर्श है।

आचार्य दंडी ने 39 अलंकारों को स्वीकार किया,जिसमें चार शब्दालंकार हैं   अनुप्रास, यमक ,चित्र ,और प्रहेलिका। ये अतिशयोक्ति अलंकार को पृथक रूप से देखते हैं। इनके मत में अतिशयोक्ति का एक अलग वैशिष्ट्य है।

 !!आचार्य रुद्रट!!

‌आचार्य रूद्रट कश्मीर के निवासी थे । जिन का समय नौवीं शताब्दी का पूर्वार्ध माना जाता है। इनके ग्रंथ का नाम काव्यादर्श है ।जिसमें  16 अध्याय 74 श्लोक हैं ।जो अलंकार संप्रदाय का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। आचार्य रुद्रट ने ही सर्वप्रथम अलंकारों का वैज्ञानिक वर्गीकरण प्रस्तुत किया था। अर्थालंकार 4 वर्गो में प्रस्तुत किया है।इन्होंने क्रम से उनका नाम वास्तव, औपम्य, अतिशय और श्लेष माना है।

!!आचार्य उद्भट!!

आचार्य उद्भट  अलंकार से संबंधित आचार्य हैं,जिन का समय आठवीं शताब्दी का उत्तरार्ध माना जाता है। इन्होंने "अलंकारसारसंग्रह "नामक ग्रंथ की रचना की, जो कि अलंकार के लिए अति महत्वपूर्ण है।उभट्ट ने अलंकारों में "समाहित" को स्वीकार किया,तथा नाट्य में "शांति रस"को भी स्थान दिया है।इन्होंने 41 अलंकारों को स्वीकार किया है और सभी अलंकारों में श्लेष को प्रधान रूप से स्वीकार करते हैं।

  !!आचार्य वामन !!

आचार्य वामन रीति सम्प्रदाय के आचार्य है।इनके ग्रंथ का नाम काव्यालंकारसूत्रवृति है।इन्होंने 32 अलंकारो का विवेचन किया है। इन्होंने व्याजोक्ति  नामक अलंकार की नवीन उद्भावना प्रस्तुत की है।वामन गुणों को काव्य का नित्य धर्म और अलंकार को काव्य का अनित्य धर्म स्वीकार करते हैं। वामन के अनुसार काव्य के शोभावर्धक गुण होते हैं उन गुणों मेंचमत्कृति लाने का कार्य अलंकार करते हैं, इस प्रकार से आचार्य वामन गुणों को ही काव्य में प्रधानता देते हैं, और अलंकार को गुणों से न्यून बताते हैं।

 

इस प्रकार भारतीय ज्ञान परंपरा में अलंकार के संदर्भ में अनेक आचार्यों का मत प्रस्तुत किया गया है ।अलंकार संप्रदाय के  प्रमुख आचार्यभामह को माना जाता है।जिन्होंने अलंकार संप्रदाय में एक अद्भुत ख्याति प्राप्त की है ।इन्हीं से अलंकार संप्रदाय की शुरुआत होती है,ऐसा आचार्यों का वक्तव्य है, जिस प्रकार बिना आभूषण के अत्यंत सुंदरी  युवती  भी शोभायमान नहीं होती, उसी प्रकार से बिना अलंकार के काव्य में उत्कृष्टता नहीं आती। इसलिए काव्य में अलंकार परम आवश्यक हैं,जिससे किसी भी कवि का काव्य समाज में उन्नत स्थान प्राप्त करें और और सहृदयों को आनंद देने वाला हो।

 

 

 

Tropical scene!!भारतीय ज्ञान परंपरा में अलंकार विमर्श!!

 

साहित्य शास्त्र में अलंकार शब्द का प्रयोग आभूषण के अर्थ में , सौंदर्य के अर्थ में किया जाता है। जैसा कि अमर सिंह ने अमरकोश में वर्णन किया -"(अलंकारस्तु आभरणं परिष्कार विभूषणम्)"।

अलंकार यह शब्द "अलम" इस उपपद के रहते "कृधातु" से "घञ"प्रत्यय करके अलंकार शब्द की निष्पत्ति होती है। अलंकार का लक्षण आचार्य भामह करते हैं,"(काव्यशोभा कराधर्मविषेशाः अलङ्कारः)"।

आचार्य दंडी लक्षण इस प्रकार करते हैं"(काव्यशोभा करान् धर्मान् अलङ्कारः प्रचक्षते)"।

प्राचीन काव्य तत्व मीमांसको  के मत में काव्य में अलंकार की महती उपयोगिता प्रतिपादित की गई है। जैसा जयदेव भी मानते हैं कि काव्य में अलंकार का होना अत्यावश्यक है,चाहे वह व्यक्त हो अथवा अभिव्यक्त रूप में ही क्यों न हो।

अलंकार का लक्षण देते हुए जयदेव कहते हैं-

"अङ्गीकरोति यः काव्यम् शब्दार्थ अनलङ्कृति

असौ न मन्यते कस्मात् अनुष्णमनलङ्कृति"।।

 

जयदेव  के इस वचन से यह प्रमाणित होता है कि काव्य में अलंकारों की उपयोगिता होती ही है। अलंकार शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार आचार्य करते हैं- "अलङ्करोति अलङ्कारः" "अलंक्रियते अनेन अलङ्कारः"।अलङ्कार का महत्व प्रतिपादित करते हुए भामह कहते है - "न कान्तमपि निर्भूषम् विभाति वनिताननम्"अर्थात् जिस  प्रकार से अनेक गुणों से  समन्वित नायिका भी बिना आभूषण के शोभायमान नहीं होती, उसी प्रकार काव्य में शब्द और अर्थ स्वरूप गुणों के समन्वित होने पर भी बिना अलंकारों के काव्य में चमत्कार नहीं होता। कहने का आशय यह है कि काव्य में अलंकार का होना अत्यावश्यक माना जाता है। जिस प्रकार अलंकार अर्थात् आभूषण नायिका के सौंदर्य को बढ़ाते हैं, उसी प्रकार अलंकार काव्य की शोभा को बढ़ाते हैं। अग्नि पुराणकार अलंकार रहित काव्य की उपमा विधवा स्त्री से देते हुए कहते हैं-"अलङ्कार रहिता  विधवेव सरस्वती" अर्थात जिस प्रकार से विधवा स्त्री समाज में उच्च स्थान को प्राप्त नहीं करती,उसी प्रकार अलंकार रहित काव्य भी समाज में अति उच्च स्थान को प्राप्त नहीं करता।

आचार्य मम्मट अनुसार अलंकार का लक्षण-

"उपकुर्वन्ति तं सन्तं येङ्गद्वारेण जातुचित्

हारादिवदलङ्काराः तेनुप्रासोपमादयः।।"

कविराज विश्वनाथ अलंकार का लक्षण-

"शब्दार्थयोः अस्थिरा ये धर्माः काव्य शोभातिशायिनः

रसादीनुपकुर्वन्तो अलंकारस्ते अङ्गदादिवत्"।।

 

!! अलङ्कारो का उद्भव एवं विकास!!

अलंकारों का सर्वप्रथम प्रयोग आचार्य भरत  ने अपने ग्रंथ नाट्यशास्त्र में किया है।आचार्य भरत ने मात्र चार ही अलंकारों को स्वीकार किया है-(यमक ,रूपक ,उपमा और दीपक)। अग्नि पुराणकार ने 15 अलंकार स्वीकार किए हैं।आचार्य वामन अपने काव्यालंकारसूत्र में 33 अलंकारों का विवेचन करते हैं ।आचार्य भामह काव्यालंकार में 39 अलंकारों का प्रतिपादन करते हैं।आचार्य मम्मट ने काव्यप्रकाश में 67 अलंकार स्वीकार कियेहैं। आचार्य विश्वनाथ ने 74 अलंकार माने हैं। जयदेव ने चंद्रलोक में 100 अलंकार स्वीकार किए हैं। इसी  क्रम में  कुवलयानंद ग्रंथ में अप्पयदीक्षित ने 120 अलंकारों का प्रयोग अत्यंत सूक्ष्मता के साथ किया है।  इस प्रकार  धीरे-धीरे संस्कृत ग्रंथों में अलंकारों की संख्या में दिन-प्रतिदिन वृद्धि देखने को मिल रही है ।वर्तमान में आचार्य अप्पयदीक्षित ने ही सबसे अधिक 120 अलंकारों को स्वीकार किया है ।

 

 

!! अलंकारों का विभाजन!!

शब्दार्थ की दृष्टि से अलंकारों के मुख्य तीन भेद आचार्य मम्मट स्वीकार  करते हैं।  1. शब्दालंकार,2. अर्थालंकार,3. उभयालंकार। शब्दालंकार के 6 भेद - (वक्रोक्ति ,अनुप्रास ,यमक, श्लेष ,चित्रालंकार पुनरुक्तवादभास )।अर्थालंकार के  61 भेद स्वीकार किया  है,जैसे (काव्यलिंगउपमेयोपमा,अनंन्वय,अतिशयोक्ति,दीपक विरोधाभास इत्यादि)।

 

 *उभयालंकार के अंतर्गत पुनरुक्तवदाभास की चर्चा की गई  है ।इस इस प्रकार आचार्य मम्मट ने अलंकारों का  विवेचन प्रस्तुत किया है।

!!अलङ्कार विषयक विभिन्न आचार्यो का मत!!

!!आचार्य भामह!!

आचार्य भामह कश्मीर के निवासी थे ।इनके पिता का नाम  रक्रिल था ।आचार्य भामह को अलंकार संप्रदाय का जनक स्वीकार  किया जाता है ।भामह का समय छठी शताब्दी का पूर्वार्ध माना जाता है ।आचार्य भामह अलंकार को काव्य का प्रमुख अंगस्वीकार  करते हैं ।भामह  ने 38 अलंकारों को स्वीकार किया है ,जिसमें दो शब्दालंकार, और 36 अर्थालंकार आते हैं। मुख्य रूप से इनके मत में वक्रोक्ति अलंकार प्रधान अलंकार है।

!!आचार्य दण्डी!!

आचार्य दण्डी अलंकार सम्प्रदाय के दूसरे प्रमुख आचार्य है।जिनका समय सातवीं शताब्दी  माना जाता है ।ये दक्षिण भारत के निवासी हैं।इनके ग्रंथ का नाम काव्यादर्श है।

आचार्य दंडी ने 39 अलंकारों को स्वीकार किया,जिसमें चार शब्दालंकार हैं   अनुप्रास, यमक ,चित्र ,और प्रहेलिका। ये अतिशयोक्ति अलंकार को पृथक रूप से देखते हैं। इनके मत में अतिशयोक्ति का एक अलग वैशिष्ट्य है।

 !!आचार्य रुद्रट!!

‌आचार्य रूद्रट कश्मीर के निवासी थे । जिन का समय नौवीं शताब्दी का पूर्वार्ध माना जाता है। इनके ग्रंथ का नाम काव्यादर्श है ।जिसमें  16 अध्याय 74 श्लोक हैं ।जो अलंकार संप्रदाय का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। आचार्य रुद्रट ने ही सर्वप्रथम अलंकारों का वैज्ञानिक वर्गीकरण प्रस्तुत किया था। अर्थालंकार 4 वर्गो में प्रस्तुत किया है।इन्होंने क्रम से उनका नाम वास्तव, औपम्य, अतिशय और श्लेष माना है।

!!आचार्य उद्भट!!

आचार्य उद्भट  अलंकार से संबंधित आचार्य हैं,जिन का समय आठवीं शताब्दी का उत्तरार्ध माना जाता है। इन्होंने "अलंकारसारसंग्रह "नामक ग्रंथ की रचना की, जो कि अलंकार के लिए अति महत्वपूर्ण है।उभट्ट ने अलंकारों में "समाहित" को स्वीकार किया,तथा नाट्य में "शांति रस"को भी स्थान दिया है।इन्होंने 41 अलंकारों को स्वीकार किया है और सभी अलंकारों में श्लेष को प्रधान रूप से स्वीकार करते हैं।

  !!आचार्य वामन !!

आचार्य वामन रीति सम्प्रदाय के आचार्य है।इनके ग्रंथ का नाम काव्यालंकारसूत्रवृति है।इन्होंने 32 अलंकारो का विवेचन किया है। इन्होंने व्याजोक्ति  नामक अलंकार की नवीन उद्भावना प्रस्तुत की है।वामन गुणों को काव्य का नित्य धर्म और अलंकार को काव्य का अनित्य धर्म स्वीकार करते हैं। वामन के अनुसार काव्य के शोभावर्धक गुण होते हैं उन गुणों मेंचमत्कृति लाने का कार्य अलंकार करते हैं, इस प्रकार से आचार्य वामन गुणों को ही काव्य में प्रधानता देते हैं, और अलंकार को गुणों से न्यून बताते हैं।

 

इस प्रकार भारतीय ज्ञान परंपरा में अलंकार के संदर्भ में अनेक आचार्यों का मत प्रस्तुत किया गया है ।अलंकार संप्रदाय के  प्रमुख आचार्यभामह को माना जाता है।जिन्होंने अलंकार संप्रदाय में एक अद्भुत ख्याति प्राप्त की है ।इन्हीं से अलंकार संप्रदाय की शुरुआत होती है,ऐसा आचार्यों का वक्तव्य है, जिस प्रकार बिना आभूषण के अत्यंत सुंदरी  युवती  भी शोभायमान नहीं होती, उसी प्रकार से बिना अलंकार के काव्य में उत्कृष्टता नहीं आती। इसलिए काव्य में अलंकार परम आवश्यक हैं,जिससे किसी भी कवि का काव्य समाज में उन्नत स्थान प्राप्त करें और और सहृदयों को आनंद देने वाला हो।

 

 

 

Tropical scene!!भारतीय ज्ञान परंपरा में अलंकार विमर्श!!

 

साहित्य शास्त्र में अलंकार शब्द का प्रयोग आभूषण के अर्थ में , सौंदर्य के अर्थ में किया जाता है। जैसा कि अमर सिंह ने अमरकोश में वर्णन किया -"(अलंकारस्तु आभरणं परिष्कार विभूषणम्)"।

अलंकार यह शब्द "अलम" इस उपपद के रहते "कृधातु" से "घञ"प्रत्यय करके अलंकार शब्द की निष्पत्ति होती है। अलंकार का लक्षण आचार्य भामह करते हैं,"(काव्यशोभा कराधर्मविषेशाः अलङ्कारः)"।

आचार्य दंडी लक्षण इस प्रकार करते हैं"(काव्यशोभा करान् धर्मान् अलङ्कारः प्रचक्षते)"।

प्राचीन काव्य तत्व मीमांसको  के मत में काव्य में अलंकार की महती उपयोगिता प्रतिपादित की गई है। जैसा जयदेव भी मानते हैं कि काव्य में अलंकार का होना अत्यावश्यक है,चाहे वह व्यक्त हो अथवा अभिव्यक्त रूप में ही क्यों न हो।

अलंकार का लक्षण देते हुए जयदेव कहते हैं-

"अङ्गीकरोति यः काव्यम् शब्दार्थ अनलङ्कृति

असौ न मन्यते कस्मात् अनुष्णमनलङ्कृति"।।

 

जयदेव  के इस वचन से यह प्रमाणित होता है कि काव्य में अलंकारों की उपयोगिता होती ही है। अलंकार शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार आचार्य करते हैं- "अलङ्करोति अलङ्कारः" "अलंक्रियते अनेन अलङ्कारः"।अलङ्कार का महत्व प्रतिपादित करते हुए भामह कहते है - "न कान्तमपि निर्भूषम् विभाति वनिताननम्"अर्थात् जिस  प्रकार से अनेक गुणों से  समन्वित नायिका भी बिना आभूषण के शोभायमान नहीं होती, उसी प्रकार काव्य में शब्द और अर्थ स्वरूप गुणों के समन्वित होने पर भी बिना अलंकारों के काव्य में चमत्कार नहीं होता। कहने का आशय यह है कि काव्य में अलंकार का होना अत्यावश्यक माना जाता है। जिस प्रकार अलंकार अर्थात् आभूषण नायिका के सौंदर्य को बढ़ाते हैं, उसी प्रकार अलंकार काव्य की शोभा को बढ़ाते हैं। अग्नि पुराणकार अलंकार रहित काव्य की उपमा विधवा स्त्री से देते हुए कहते हैं-"अलङ्कार रहिता  विधवेव सरस्वती" अर्थात जिस प्रकार से विधवा स्त्री समाज में उच्च स्थान को प्राप्त नहीं करती,उसी प्रकार अलंकार रहित काव्य भी समाज में अति उच्च स्थान को प्राप्त नहीं करता।

आचार्य मम्मट अनुसार अलंकार का लक्षण-

"उपकुर्वन्ति तं सन्तं येङ्गद्वारेण जातुचित्

हारादिवदलङ्काराः तेनुप्रासोपमादयः।।"

कविराज विश्वनाथ अलंकार का लक्षण-

"शब्दार्थयोः अस्थिरा ये धर्माः काव्य शोभातिशायिनः

रसादीनुपकुर्वन्तो अलंकारस्ते अङ्गदादिवत्"।।

 

!! अलङ्कारो का उद्भव एवं विकास!!

अलंकारों का सर्वप्रथम प्रयोग आचार्य भरत  ने अपने ग्रंथ नाट्यशास्त्र में किया है।आचार्य भरत ने मात्र चार ही अलंकारों को स्वीकार किया है-(यमक ,रूपक ,उपमा और दीपक)। अग्नि पुराणकार ने 15 अलंकार स्वीकार किए हैं।आचार्य वामन अपने काव्यालंकारसूत्र में 33 अलंकारों का विवेचन करते हैं ।आचार्य भामह काव्यालंकार में 39 अलंकारों का प्रतिपादन करते हैं।आचार्य मम्मट ने काव्यप्रकाश में 67 अलंकार स्वीकार कियेहैं। आचार्य विश्वनाथ ने 74 अलंकार माने हैं। जयदेव ने चंद्रलोक में 100 अलंकार स्वीकार किए हैं। इसी  क्रम में  कुवलयानंद ग्रंथ में अप्पयदीक्षित ने 120 अलंकारों का प्रयोग अत्यंत सूक्ष्मता के साथ किया है।  इस प्रकार  धीरे-धीरे संस्कृत ग्रंथों में अलंकारों की संख्या में दिन-प्रतिदिन वृद्धि देखने को मिल रही है ।वर्तमान में आचार्य अप्पयदीक्षित ने ही सबसे अधिक 120 अलंकारों को स्वीकार किया है ।

 

 

!! अलंकारों का विभाजन!!

शब्दार्थ की दृष्टि से अलंकारों के मुख्य तीन भेद आचार्य मम्मट स्वीकार  करते हैं।  1. शब्दालंकार,2. अर्थालंकार,3. उभयालंकार। शब्दालंकार के 6 भेद - (वक्रोक्ति ,अनुप्रास ,यमक, श्लेष ,चित्रालंकार पुनरुक्तवादभास )।अर्थालंकार के  61 भेद स्वीकार किया  है,जैसे (काव्यलिंगउपमेयोपमा,अनंन्वय,अतिशयोक्ति,दीपक विरोधाभास इत्यादि)।

 

 *उभयालंकार के अंतर्गत पुनरुक्तवदाभास की चर्चा की गई  है ।इस इस प्रकार आचार्य मम्मट ने अलंकारों का  विवेचन प्रस्तुत किया है।

!!अलङ्कार विषयक विभिन्न आचार्यो का मत!!

!!आचार्य भामह!!

आचार्य भामह कश्मीर के निवासी थे ।इनके पिता का नाम  रक्रिल था ।आचार्य भामह को अलंकार संप्रदाय का जनक स्वीकार  किया जाता है ।भामह का समय छठी शताब्दी का पूर्वार्ध माना जाता है ।आचार्य भामह अलंकार को काव्य का प्रमुख अंगस्वीकार  करते हैं ।भामह  ने 38 अलंकारों को स्वीकार किया है ,जिसमें दो शब्दालंकार, और 36 अर्थालंकार आते हैं। मुख्य रूप से इनके मत में वक्रोक्ति अलंकार प्रधान अलंकार है।

!!आचार्य दण्डी!!

आचार्य दण्डी अलंकार सम्प्रदाय के दूसरे प्रमुख आचार्य है।जिनका समय सातवीं शताब्दी  माना जाता है ।ये दक्षिण भारत के निवासी हैं।इनके ग्रंथ का नाम काव्यादर्श है।

आचार्य दंडी ने 39 अलंकारों को स्वीकार किया,जिसमें चार शब्दालंकार हैं   अनुप्रास, यमक ,चित्र ,और प्रहेलिका। ये अतिशयोक्ति अलंकार को पृथक रूप से देखते हैं। इनके मत में अतिशयोक्ति का एक अलग वैशिष्ट्य है।

 !!आचार्य रुद्रट!!

‌आचार्य रूद्रट कश्मीर के निवासी थे । जिन का समय नौवीं शताब्दी का पूर्वार्ध माना जाता है। इनके ग्रंथ का नाम काव्यादर्श है ।जिसमें  16 अध्याय 74 श्लोक हैं ।जो अलंकार संप्रदाय का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। आचार्य रुद्रट ने ही सर्वप्रथम अलंकारों का वैज्ञानिक वर्गीकरण प्रस्तुत किया था। अर्थालंकार 4 वर्गो में प्रस्तुत किया है।इन्होंने क्रम से उनका नाम वास्तव, औपम्य, अतिशय और श्लेष माना है।

!!आचार्य उद्भट!!

आचार्य उद्भट  अलंकार से संबंधित आचार्य हैं,जिन का समय आठवीं शताब्दी का उत्तरार्ध माना जाता है। इन्होंने "अलंकारसारसंग्रह "नामक ग्रंथ की रचना की, जो कि अलंकार के लिए अति महत्वपूर्ण है।उभट्ट ने अलंकारों में "समाहित" को स्वीकार किया,तथा नाट्य में "शांति रस"को भी स्थान दिया है।इन्होंने 41 अलंकारों को स्वीकार किया है और सभी अलंकारों में श्लेष को प्रधान रूप से स्वीकार करते हैं।

  !!आचार्य वामन !!

आचार्य वामन रीति सम्प्रदाय के आचार्य है।इनके ग्रंथ का नाम काव्यालंकारसूत्रवृति है।इन्होंने 32 अलंकारो का विवेचन किया है। इन्होंने व्याजोक्ति  नामक अलंकार की नवीन उद्भावना प्रस्तुत की है।वामन गुणों को काव्य का नित्य धर्म और अलंकार को काव्य का अनित्य धर्म स्वीकार करते हैं। वामन के अनुसार काव्य के शोभावर्धक गुण होते हैं उन गुणों मेंचमत्कृति लाने का कार्य अलंकार करते हैं, इस प्रकार से आचार्य वामन गुणों को ही काव्य में प्रधानता देते हैं, और अलंकार को गुणों से न्यून बताते हैं।

 

इस प्रकार भारतीय ज्ञान परंपरा में अलंकार के संदर्भ में अनेक आचार्यों का मत प्रस्तुत किया गया है ।अलंकार संप्रदाय के  प्रमुख आचार्यभामह को माना जाता है।जिन्होंने अलंकार संप्रदाय में एक अद्भुत ख्याति प्राप्त की है ।इन्हीं से अलंकार संप्रदाय की शुरुआत होती है,ऐसा आचार्यों का वक्तव्य है, जिस प्रकार बिना आभूषण के अत्यंत सुंदरी  युवती  भी शोभायमान नहीं होती, उसी प्रकार से बिना अलंकार के काव्य में उत्कृष्टता नहीं आती। इसलिए काव्य में अलंकार परम आवश्यक हैं,जिससे किसी भी कवि का काव्य समाज में उन्नत स्थान प्राप्त करें और और सहृदयों को आनंद देने वाला हो।

 

 

 

Tropical scene!!भारतीय ज्ञान परंपरा में अलंकार विमर्श!!

 

साहित्य शास्त्र में अलंकार शब्द का प्रयोग आभूषण के अर्थ में , सौंदर्य के अर्थ में किया जाता है। जैसा कि अमर सिंह ने अमरकोश में वर्णन किया -"(अलंकारस्तु आभरणं परिष्कार विभूषणम्)"।

अलंकार यह शब्द "अलम" इस उपपद के रहते "कृधातु" से "घञ"प्रत्यय करके अलंकार शब्द की निष्पत्ति होती है। अलंकार का लक्षण आचार्य भामह करते हैं,"(काव्यशोभा कराधर्मविषेशाः अलङ्कारः)"।

आचार्य दंडी लक्षण इस प्रकार करते हैं"(काव्यशोभा करान् धर्मान् अलङ्कारः प्रचक्षते)"।

प्राचीन काव्य तत्व मीमांसको  के मत में काव्य में अलंकार की महती उपयोगिता प्रतिपादित की गई है। जैसा जयदेव भी मानते हैं कि काव्य में अलंकार का होना अत्यावश्यक है,चाहे वह व्यक्त हो अथवा अभिव्यक्त रूप में ही क्यों न हो।

अलंकार का लक्षण देते हुए जयदेव कहते हैं-

"अङ्गीकरोति यः काव्यम् शब्दार्थ अनलङ्कृति

असौ न मन्यते कस्मात् अनुष्णमनलङ्कृति"।।

 

जयदेव  के इस वचन से यह प्रमाणित होता है कि काव्य में अलंकारों की उपयोगिता होती ही है। अलंकार शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार आचार्य करते हैं- "अलङ्करोति अलङ्कारः" "अलंक्रियते अनेन अलङ्कारः"।अलङ्कार का महत्व प्रतिपादित करते हुए भामह कहते है - "न कान्तमपि निर्भूषम् विभाति वनिताननम्"अर्थात् जिस  प्रकार से अनेक गुणों से  समन्वित नायिका भी बिना आभूषण के शोभायमान नहीं होती, उसी प्रकार काव्य में शब्द और अर्थ स्वरूप गुणों के समन्वित होने पर भी बिना अलंकारों के काव्य में चमत्कार नहीं होता। कहने का आशय यह है कि काव्य में अलंकार का होना अत्यावश्यक माना जाता है। जिस प्रकार अलंकार अर्थात् आभूषण नायिका के सौंदर्य को बढ़ाते हैं, उसी प्रकार अलंकार काव्य की शोभा को बढ़ाते हैं। अग्नि पुराणकार अलंकार रहित काव्य की उपमा विधवा स्त्री से देते हुए कहते हैं-"अलङ्कार रहिता  विधवेव सरस्वती" अर्थात जिस प्रकार से विधवा स्त्री समाज में उच्च स्थान को प्राप्त नहीं करती,उसी प्रकार अलंकार रहित काव्य भी समाज में अति उच्च स्थान को प्राप्त नहीं करता।

आचार्य मम्मट अनुसार अलंकार का लक्षण-

"उपकुर्वन्ति तं सन्तं येङ्गद्वारेण जातुचित्

हारादिवदलङ्काराः तेनुप्रासोपमादयः।।"

कविराज विश्वनाथ अलंकार का लक्षण-

"शब्दार्थयोः अस्थिरा ये धर्माः काव्य शोभातिशायिनः

रसादीनुपकुर्वन्तो अलंकारस्ते अङ्गदादिवत्"।।

 

!! अलङ्कारो का उद्भव एवं विकास!!

अलंकारों का सर्वप्रथम प्रयोग आचार्य भरत  ने अपने ग्रंथ नाट्यशास्त्र में किया है।आचार्य भरत ने मात्र चार ही अलंकारों को स्वीकार किया है-(यमक ,रूपक ,उपमा और दीपक)। अग्नि पुराणकार ने 15 अलंकार स्वीकार किए हैं।आचार्य वामन अपने काव्यालंकारसूत्र में 33 अलंकारों का विवेचन करते हैं ।आचार्य भामह काव्यालंकार में 39 अलंकारों का प्रतिपादन करते हैं।आचार्य मम्मट ने काव्यप्रकाश में 67 अलंकार स्वीकार कियेहैं। आचार्य विश्वनाथ ने 74 अलंकार माने हैं। जयदेव ने चंद्रलोक में 100 अलंकार स्वीकार किए हैं। इसी  क्रम में  कुवलयानंद ग्रंथ में अप्पयदीक्षित ने 120 अलंकारों का प्रयोग अत्यंत सूक्ष्मता के साथ किया है।  इस प्रकार  धीरे-धीरे संस्कृत ग्रंथों में अलंकारों की संख्या में दिन-प्रतिदिन वृद्धि देखने को मिल रही है ।वर्तमान में आचार्य अप्पयदीक्षित ने ही सबसे अधिक 120 अलंकारों को स्वीकार किया है ।

 

 

!! अलंकारों का विभाजन!!

शब्दार्थ की दृष्टि से अलंकारों के मुख्य तीन भेद आचार्य मम्मट स्वीकार  करते हैं।  1. शब्दालंकार,2. अर्थालंकार,3. उभयालंकार। शब्दालंकार के 6 भेद - (वक्रोक्ति ,अनुप्रास ,यमक, श्लेष ,चित्रालंकार पुनरुक्तवादभास )।अर्थालंकार के  61 भेद स्वीकार किया  है,जैसे (काव्यलिंगउपमेयोपमा,अनंन्वय,अतिशयोक्ति,दीपक विरोधाभास इत्यादि)।

 

 *उभयालंकार के अंतर्गत पुनरुक्तवदाभास की चर्चा की गई  है ।इस इस प्रकार आचार्य मम्मट ने अलंकारों का  विवेचन प्रस्तुत किया है।

!!अलङ्कार विषयक विभिन्न आचार्यो का मत!!

!!आचार्य भामह!!

आचार्य भामह कश्मीर के निवासी थे ।इनके पिता का नाम  रक्रिल था ।आचार्य भामह को अलंकार संप्रदाय का जनक स्वीकार  किया जाता है ।भामह का समय छठी शताब्दी का पूर्वार्ध माना जाता है ।आचार्य भामह अलंकार को काव्य का प्रमुख अंगस्वीकार  करते हैं ।भामह  ने 38 अलंकारों को स्वीकार किया है ,जिसमें दो शब्दालंकार, और 36 अर्थालंकार आते हैं। मुख्य रूप से इनके मत में वक्रोक्ति अलंकार प्रधान अलंकार है।

!!आचार्य दण्डी!!

आचार्य दण्डी अलंकार सम्प्रदाय के दूसरे प्रमुख आचार्य है।जिनका समय सातवीं शताब्दी  माना जाता है ।ये दक्षिण भारत के निवासी हैं।इनके ग्रंथ का नाम काव्यादर्श है।

आचार्य दंडी ने 39 अलंकारों को स्वीकार किया,जिसमें चार शब्दालंकार हैं   अनुप्रास, यमक ,चित्र ,और प्रहेलिका। ये अतिशयोक्ति अलंकार को पृथक रूप से देखते हैं। इनके मत में अतिशयोक्ति का एक अलग वैशिष्ट्य है।

 !!आचार्य रुद्रट!!

‌आचार्य रूद्रट कश्मीर के निवासी थे । जिन का समय नौवीं शताब्दी का पूर्वार्ध माना जाता है। इनके ग्रंथ का नाम काव्यादर्श है ।जिसमें  16 अध्याय 74 श्लोक हैं ।जो अलंकार संप्रदाय का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। आचार्य रुद्रट ने ही सर्वप्रथम अलंकारों का वैज्ञानिक वर्गीकरण प्रस्तुत किया था। अर्थालंकार 4 वर्गो में प्रस्तुत किया है।इन्होंने क्रम से उनका नाम वास्तव, औपम्य, अतिशय और श्लेष माना है।

!!आचार्य उद्भट!!

आचार्य उद्भट  अलंकार से संबंधित आचार्य हैं,जिन का समय आठवीं शताब्दी का उत्तरार्ध माना जाता है। इन्होंने "अलंकारसारसंग्रह "नामक ग्रंथ की रचना की, जो कि अलंकार के लिए अति महत्वपूर्ण है।उभट्ट ने अलंकारों में "समाहित" को स्वीकार किया,तथा नाट्य में "शांति रस"को भी स्थान दिया है।इन्होंने 41 अलंकारों को स्वीकार किया है और सभी अलंकारों में श्लेष को प्रधान रूप से स्वीकार करते हैं।

  !!आचार्य वामन !!

आचार्य वामन रीति सम्प्रदाय के आचार्य है।इनके ग्रंथ का नाम काव्यालंकारसूत्रवृति है।इन्होंने 32 अलंकारो का विवेचन किया है। इन्होंने व्याजोक्ति  नामक अलंकार की नवीन उद्भावना प्रस्तुत की है।वामन गुणों को काव्य का नित्य धर्म और अलंकार को काव्य का अनित्य धर्म स्वीकार करते हैं। वामन के अनुसार काव्य के शोभावर्धक गुण होते हैं उन गुणों मेंचमत्कृति लाने का कार्य अलंकार करते हैं, इस प्रकार से आचार्य वामन गुणों को ही काव्य में प्रधानता देते हैं, और अलंकार को गुणों से न्यून बताते हैं।

 

इस प्रकार भारतीय ज्ञान परंपरा में अलंकार के संदर्भ में अनेक आचार्यों का मत प्रस्तुत किया गया है ।अलंकार संप्रदाय के  प्रमुख आचार्यभामह को माना जाता है।जिन्होंने अलंकार संप्रदाय में एक अद्भुत ख्याति प्राप्त की है ।इन्हीं से अलंकार संप्रदाय की शुरुआत होती है,ऐसा आचार्यों का वक्तव्य है, जिस प्रकार बिना आभूषण के अत्यंत सुंदरी  युवती  भी शोभायमान नहीं होती, उसी प्रकार से बिना अलंकार के काव्य में उत्कृष्टता नहीं आती। इसलिए काव्य में अलंकार परम आवश्यक हैं,जिससे किसी भी कवि का काव्य समाज में उन्नत स्थान प्राप्त करें और और सहृदयों को आनंद देने वाला हो।

 

 

 

Tropical scene!!भारतीय ज्ञान परंपरा में अलंकार विमर्श!!

 

साहित्य शास्त्र में अलंकार शब्द का प्रयोग आभूषण के अर्थ में , सौंदर्य के अर्थ में किया जाता है। जैसा कि अमर सिंह ने अमरकोश में वर्णन किया -"(अलंकारस्तु आभरणं परिष्कार विभूषणम्)"।

अलंकार यह शब्द "अलम" इस उपपद के रहते "कृधातु" से "घञ"प्रत्यय करके अलंकार शब्द की निष्पत्ति होती है। अलंकार का लक्षण आचार्य भामह करते हैं,"(काव्यशोभा कराधर्मविषेशाः अलङ्कारः)"।

आचार्य दंडी लक्षण इस प्रकार करते हैं"(काव्यशोभा करान् धर्मान् अलङ्कारः प्रचक्षते)"।

प्राचीन काव्य तत्व मीमांसको  के मत में काव्य में अलंकार की महती उपयोगिता प्रतिपादित की गई है। जैसा जयदेव भी मानते हैं कि काव्य में अलंकार का होना अत्यावश्यक है,चाहे वह व्यक्त हो अथवा अभिव्यक्त रूप में ही क्यों न हो।

अलंकार का लक्षण देते हुए जयदेव कहते हैं-

"अङ्गीकरोति यः काव्यम् शब्दार्थ अनलङ्कृति

असौ न मन्यते कस्मात् अनुष्णमनलङ्कृति"।।

 

जयदेव  के इस वचन से यह प्रमाणित होता है कि काव्य में अलंकारों की उपयोगिता होती ही है। अलंकार शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार आचार्य करते हैं- "अलङ्करोति अलङ्कारः" "अलंक्रियते अनेन अलङ्कारः"।अलङ्कार का महत्व प्रतिपादित करते हुए भामह कहते है - "न कान्तमपि निर्भूषम् विभाति वनिताननम्"अर्थात् जिस  प्रकार से अनेक गुणों से  समन्वित नायिका भी बिना आभूषण के शोभायमान नहीं होती, उसी प्रकार काव्य में शब्द और अर्थ स्वरूप गुणों के समन्वित होने पर भी बिना अलंकारों के काव्य में चमत्कार नहीं होता। कहने का आशय यह है कि काव्य में अलंकार का होना अत्यावश्यक माना जाता है। जिस प्रकार अलंकार अर्थात् आभूषण नायिका के सौंदर्य को बढ़ाते हैं, उसी प्रकार अलंकार काव्य की शोभा को बढ़ाते हैं। अग्नि पुराणकार अलंकार रहित काव्य की उपमा विधवा स्त्री से देते हुए कहते हैं-"अलङ्कार रहिता  विधवेव सरस्वती" अर्थात जिस प्रकार से विधवा स्त्री समाज में उच्च स्थान को प्राप्त नहीं करती,उसी प्रकार अलंकार रहित काव्य भी समाज में अति उच्च स्थान को प्राप्त नहीं करता।

आचार्य मम्मट अनुसार अलंकार का लक्षण-

"उपकुर्वन्ति तं सन्तं येङ्गद्वारेण जातुचित्

हारादिवदलङ्काराः तेनुप्रासोपमादयः।।"

कविराज विश्वनाथ अलंकार का लक्षण-

"शब्दार्थयोः अस्थिरा ये धर्माः काव्य शोभातिशायिनः

रसादीनुपकुर्वन्तो अलंकारस्ते अङ्गदादिवत्"।।

 

!! अलङ्कारो का उद्भव एवं विकास!!

अलंकारों का सर्वप्रथम प्रयोग आचार्य भरत  ने अपने ग्रंथ नाट्यशास्त्र में किया है।आचार्य भरत ने मात्र चार ही अलंकारों को स्वीकार किया है-(यमक ,रूपक ,उपमा और दीपक)। अग्नि पुराणकार ने 15 अलंकार स्वीकार किए हैं।आचार्य वामन अपने काव्यालंकारसूत्र में 33 अलंकारों का विवेचन करते हैं ।आचार्य भामह काव्यालंकार में 39 अलंकारों का प्रतिपादन करते हैं।आचार्य मम्मट ने काव्यप्रकाश में 67 अलंकार स्वीकार कियेहैं। आचार्य विश्वनाथ ने 74 अलंकार माने हैं। जयदेव ने चंद्रलोक में 100 अलंकार स्वीकार किए हैं। इसी  क्रम में  कुवलयानंद ग्रंथ में अप्पयदीक्षित ने 120 अलंकारों का प्रयोग अत्यंत सूक्ष्मता के साथ किया है।  इस प्रकार  धीरे-धीरे संस्कृत ग्रंथों में अलंकारों की संख्या में दिन-प्रतिदिन वृद्धि देखने को मिल रही है ।वर्तमान में आचार्य अप्पयदीक्षित ने ही सबसे अधिक 120 अलंकारों को स्वीकार किया है ।

 

 

!! अलंकारों का विभाजन!!

शब्दार्थ की दृष्टि से अलंकारों के मुख्य तीन भेद आचार्य मम्मट स्वीकार  करते हैं।  1. शब्दालंकार,2. अर्थालंकार,3. उभयालंकार। शब्दालंकार के 6 भेद - (वक्रोक्ति ,अनुप्रास ,यमक, श्लेष ,चित्रालंकार पुनरुक्तवादभास )।अर्थालंकार के  61 भेद स्वीकार किया  है,जैसे (काव्यलिंगउपमेयोपमा,अनंन्वय,अतिशयोक्ति,दीपक विरोधाभास इत्यादि)।

 

 *उभयालंकार के अंतर्गत पुनरुक्तवदाभास की चर्चा की गई  है ।इस इस प्रकार आचार्य मम्मट ने अलंकारों का  विवेचन प्रस्तुत किया है।

!!अलङ्कार विषयक विभिन्न आचार्यो का मत!!

!!आचार्य भामह!!

आचार्य भामह कश्मीर के निवासी थे ।इनके पिता का नाम  रक्रिल था ।आचार्य भामह को अलंकार संप्रदाय का जनक स्वीकार  किया जाता है ।भामह का समय छठी शताब्दी का पूर्वार्ध माना जाता है ।आचार्य भामह अलंकार को काव्य का प्रमुख अंगस्वीकार  करते हैं ।भामह  ने 38 अलंकारों को स्वीकार किया है ,जिसमें दो शब्दालंकार, और 36 अर्थालंकार आते हैं। मुख्य रूप से इनके मत में वक्रोक्ति अलंकार प्रधान अलंकार है।

!!आचार्य दण्डी!!

आचार्य दण्डी अलंकार सम्प्रदाय के दूसरे प्रमुख आचार्य है।जिनका समय सातवीं शताब्दी  माना जाता है ।ये दक्षिण भारत के निवासी हैं।इनके ग्रंथ का नाम काव्यादर्श है।

आचार्य दंडी ने 39 अलंकारों को स्वीकार किया,जिसमें चार शब्दालंकार हैं   अनुप्रास, यमक ,चित्र ,और प्रहेलिका। ये अतिशयोक्ति अलंकार को पृथक रूप से देखते हैं। इनके मत में अतिशयोक्ति का एक अलग वैशिष्ट्य है।

 !!आचार्य रुद्रट!!

‌आचार्य रूद्रट कश्मीर के निवासी थे । जिन का समय नौवीं शताब्दी का पूर्वार्ध माना जाता है। इनके ग्रंथ का नाम काव्यादर्श है ।जिसमें  16 अध्याय 74 श्लोक हैं ।जो अलंकार संप्रदाय का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। आचार्य रुद्रट ने ही सर्वप्रथम अलंकारों का वैज्ञानिक वर्गीकरण प्रस्तुत किया था। अर्थालंकार 4 वर्गो में प्रस्तुत किया है।इन्होंने क्रम से उनका नाम वास्तव, औपम्य, अतिशय और श्लेष माना है।

!!आचार्य उद्भट!!

आचार्य उद्भट  अलंकार से संबंधित आचार्य हैं,जिन का समय आठवीं शताब्दी का उत्तरार्ध माना जाता है। इन्होंने "अलंकारसारसंग्रह "नामक ग्रंथ की रचना की, जो कि अलंकार के लिए अति महत्वपूर्ण है।उभट्ट ने अलंकारों में "समाहित" को स्वीकार किया,तथा नाट्य में "शांति रस"को भी स्थान दिया है।इन्होंने 41 अलंकारों को स्वीकार किया है और सभी अलंकारों में श्लेष को प्रधान रूप से स्वीकार करते हैं।

  !!आचार्य वामन !!

आचार्य वामन रीति सम्प्रदाय के आचार्य है।इनके ग्रंथ का नाम काव्यालंकारसूत्रवृति है।इन्होंने 32 अलंकारो का विवेचन किया है। इन्होंने व्याजोक्ति  नामक अलंकार की नवीन उद्भावना प्रस्तुत की है।वामन गुणों को काव्य का नित्य धर्म और अलंकार को काव्य का अनित्य धर्म स्वीकार करते हैं। वामन के अनुसार काव्य के शोभावर्धक गुण होते हैं उन गुणों मेंचमत्कृति लाने का कार्य अलंकार करते हैं, इस प्रकार से आचार्य वामन गुणों को ही काव्य में प्रधानता देते हैं, और अलंकार को गुणों से न्यून बताते हैं।

 

इस प्रकार भारतीय ज्ञान परंपरा में अलंकार के संदर्भ में अनेक आचार्यों का मत प्रस्तुत किया गया है ।अलंकार संप्रदाय के  प्रमुख आचार्यभामह को माना जाता है।जिन्होंने अलंकार संप्रदाय में एक अद्भुत ख्याति प्राप्त की है ।इन्हीं से अलंकार संप्रदाय की शुरुआत होती है,ऐसा आचार्यों का वक्तव्य है, जिस प्रकार बिना आभूषण के अत्यंत सुंदरी  युवती  भी शोभायमान नहीं होती, उसी प्रकार से बिना अलंकार के काव्य में उत्कृष्टता नहीं आती। इसलिए काव्य में अलंकार परम आवश्यक हैं,जिससे किसी भी कवि का काव्य समाज में उन्नत स्थान प्राप्त करें और और सहृदयों को आनंद देने वाला हो।

 

 

 

Tropical scene

!!भारतीय ज्ञान परंपरा में अलंकार विमर्श!!

 

साहित्य शास्त्र में अलंकार शब्द का प्रयोग आभूषण के अर्थ में , सौंदर्य के अर्थ में किया जाता है। जैसा कि अमर सिंह ने अमरकोश में वर्णन किया -"(अलंकारस्तु आभरणं परिष्कार विभूषणम्)"।

अलंकार यह शब्द "अलम" इस उपपद के रहते "कृधातु" से "घञ"प्रत्यय करके अलंकार शब्द की निष्पत्ति होती है। अलंकार का लक्षण आचार्य भामह करते हैं,"(काव्यशोभा कराधर्मविषेशाः अलङ्कारः)"।

आचार्य दंडी लक्षण इस प्रकार करते हैं"(काव्यशोभा करान् धर्मान् अलङ्कारः प्रचक्षते)"।

प्राचीन काव्य तत्व मीमांसको  के मत में काव्य में अलंकार की महती उपयोगिता प्रतिपादित की गई है। जैसा जयदेव भी मानते हैं कि काव्य में अलंकार का होना अत्यावश्यक है,चाहे वह व्यक्त हो अथवा अभिव्यक्त रूप में ही क्यों न हो।

अलंकार का लक्षण देते हुए जयदेव कहते हैं-

"अङ्गीकरोति यः काव्यम् शब्दार्थ अनलङ्कृति

असौ न मन्यते कस्मात् अनुष्णमनलङ्कृति"।।

 

जयदेव  के इस वचन से यह प्रमाणित होता है कि काव्य में अलंकारों की उपयोगिता होती ही है। अलंकार शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार आचार्य करते हैं- "अलङ्करोति अलङ्कारः" "अलंक्रियते अनेन अलङ्कारः"।अलङ्कार का महत्व प्रतिपादित करते हुए भामह कहते है - "न कान्तमपि निर्भूषम् विभाति वनिताननम्"अर्थात् जिस  प्रकार से अनेक गुणों से  समन्वित नायिका भी बिना आभूषण के शोभायमान नहीं होती, उसी प्रकार काव्य में शब्द और अर्थ स्वरूप गुणों के समन्वित होने पर भी बिना अलंकारों के काव्य में चमत्कार नहीं होता। कहने का आशय यह है कि काव्य में अलंकार का होना अत्यावश्यक माना जाता है। जिस प्रकार अलंकार अर्थात् आभूषण नायिका के सौंदर्य को बढ़ाते हैं, उसी प्रकार अलंकार काव्य की शोभा को बढ़ाते हैं। अग्नि पुराणकार अलंकार रहित काव्य की उपमा विधवा स्त्री से देते हुए कहते हैं-"अलङ्कार रहिता  विधवेव सरस्वती" अर्थात जिस प्रकार से विधवा स्त्री समाज में उच्च स्थान को प्राप्त नहीं करती,उसी प्रकार अलंकार रहित काव्य भी समाज में अति उच्च स्थान को प्राप्त नहीं करता।

आचार्य मम्मट अनुसार अलंकार का लक्षण-

"उपकुर्वन्ति तं सन्तं येङ्गद्वारेण जातुचित्

हारादिवदलङ्काराः तेनुप्रासोपमादयः।।"

कविराज विश्वनाथ अलंकार का लक्षण-

"शब्दार्थयोः अस्थिरा ये धर्माः काव्य शोभातिशायिनः

रसादीनुपकुर्वन्तो अलंकारस्ते अङ्गदादिवत्"।।

 

!! अलङ्कारो का उद्भव एवं विकास!!

अलंकारों का सर्वप्रथम प्रयोग आचार्य भरत  ने अपने ग्रंथ नाट्यशास्त्र में किया है।आचार्य भरत ने मात्र चार ही अलंकारों को स्वीकार किया है-(यमक ,रूपक ,उपमा और दीपक)। अग्नि पुराणकार ने 15 अलंकार स्वीकार किए हैं।आचार्य वामन अपने काव्यालंकारसूत्र में 33 अलंकारों का विवेचन करते हैं ।आचार्य भामह काव्यालंकार में 39 अलंकारों का प्रतिपादन करते हैं।आचार्य मम्मट ने काव्यप्रकाश में 67 अलंकार स्वीकार कियेहैं। आचार्य विश्वनाथ ने 74 अलंकार माने हैं। जयदेव ने चंद्रलोक में 100 अलंकार स्वीकार किए हैं। इसी  क्रम में  कुवलयानंद ग्रंथ में अप्पयदीक्षित ने 120 अलंकारों का प्रयोग अत्यंत सूक्ष्मता के साथ किया है।  इस प्रकार  धीरे-धीरे संस्कृत ग्रंथों में अलंकारों की संख्या में दिन-प्रतिदिन वृद्धि देखने को मिल रही है ।वर्तमान में आचार्य अप्पयदीक्षित ने ही सबसे अधिक 120 अलंकारों को स्वीकार किया है ।

 

 

!! अलंकारों का विभाजन!!

शब्दार्थ की दृष्टि से अलंकारों के मुख्य तीन भेद आचार्य मम्मट स्वीकार  करते हैं।  1. शब्दालंकार,2. अर्थालंकार,3. उभयालंकार। शब्दालंकार के 6 भेद - (वक्रोक्ति ,अनुप्रास ,यमक, श्लेष ,चित्रालंकार पुनरुक्तवादभास )।अर्थालंकार के  61 भेद स्वीकार किया  है,जैसे (काव्यलिंग,  उपमेयोपमा,अनंन्वय,अतिशयोक्ति,दीपक विरोधाभास इत्यादि)।

 

 *उभयालंकार के अंतर्गत पुनरुक्तवदाभास की चर्चा की गई  है ।इस इस प्रकार आचार्य मम्मट ने अलंकारों का  विवेचन प्रस्तुत किया है।

!!अलङ्कार विषयक विभिन्न आचार्यो का मत!!

!!आचार्य भामह!!

आचार्य भामह कश्मीर के निवासी थे ।इनके पिता का नाम  रक्रिल था ।आचार्य भामह को अलंकार संप्रदाय का जनक स्वीकार  किया जाता है ।भामह का समय छठी शताब्दी का पूर्वार्ध माना जाता है ।आचार्य भामह अलंकार को काव्य का प्रमुख अंगस्वीकार  करते हैं ।भामह  ने 38 अलंकारों को स्वीकार किया है ,जिसमें दो शब्दालंकार, और 36 अर्थालंकार आते हैं। मुख्य रूप से इनके मत में वक्रोक्ति अलंकार प्रधान अलंकार है।

!!आचार्य दण्डी!!

आचार्य दण्डी अलंकार सम्प्रदाय के दूसरे प्रमुख आचार्य है।जिनका समय सातवीं शताब्दी  माना जाता है ।ये दक्षिण भारत के निवासी हैं।इनके ग्रंथ का नाम काव्यादर्श है।

आचार्य दंडी ने 39 अलंकारों को स्वीकार किया,जिसमें चार शब्दालंकार हैं   अनुप्रास, यमक ,चित्र ,और प्रहेलिका। ये अतिशयोक्ति अलंकार को पृथक रूप से देखते हैं। इनके मत में अतिशयोक्ति का एक अलग वैशिष्ट्य है।

 !!आचार्य रुद्रट!!

‌आचार्य रूद्रट कश्मीर के निवासी थे । जिन का समय नौवीं शताब्दी का पूर्वार्ध माना जाता है। इनके ग्रंथ का नाम काव्यादर्श है ।जिसमें  16 अध्याय 74 श्लोक हैं ।जो अलंकार संप्रदाय का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। आचार्य रुद्रट ने ही सर्वप्रथम अलंकारों का वैज्ञानिक वर्गीकरण प्रस्तुत किया था। अर्थालंकार 4 वर्गो में प्रस्तुत किया है।इन्होंने क्रम से उनका नाम वास्तव, औपम्य, अतिशय और श्लेष माना है।

!!आचार्य उद्भट!!

आचार्य उद्भट  अलंकार से संबंधित आचार्य हैं,जिन का समय आठवीं शताब्दी का उत्तरार्ध माना जाता है। इन्होंने "अलंकारसारसंग्रह "नामक ग्रंथ की रचना की, जो कि अलंकार के लिए अति महत्वपूर्ण है।उभट्ट ने अलंकारों में "समाहित" को स्वीकार किया,तथा नाट्य में "शांति रस"को भी स्थान दिया है।इन्होंने 41 अलंकारों को स्वीकार किया है और सभी अलंकारों में श्लेष को प्रधान रूप से स्वीकार करते हैं।

  !!आचार्य वामन !!

आचार्य वामन रीति सम्प्रदाय के आचार्य है।इनके ग्रंथ का नाम काव्यालंकारसूत्रवृति है।इन्होंने 32 अलंकारो का विवेचन किया है। इन्होंने व्याजोक्ति  नामक अलंकार की नवीन उद्भावना प्रस्तुत की है।वामन गुणों को काव्य का नित्य धर्म और अलंकार को काव्य का अनित्य धर्म स्वीकार करते हैं। वामन के अनुसार काव्य के शोभावर्धक गुण होते हैं उन गुणों मेंचमत्कृति लाने का कार्य अलंकार करते हैं, इस प्रकार से आचार्य वामन गुणों को ही काव्य में प्रधानता देते हैं, और अलंकार को गुणों से न्यून बताते हैं।

 

इस प्रकार भारतीय ज्ञान परंपरा में अलंकार के संदर्भ में अनेक आचार्यों का मत प्रस्तुत किया गया है ।अलंकार संप्रदाय के  प्रमुख आचार्यभामह को माना जाता है।जिन्होंने अलंकार संप्रदाय में एक अद्भुत ख्याति प्राप्त की है ।इन्हीं से अलंकार संप्रदाय की शुरुआत होती है,ऐसा आचार्यों का वक्तव्य है, जिस प्रकार बिना आभूषण के अत्यंत सुंदरी  युवती  भी शोभायमान नहीं होती, उसी प्रकार से बिना अलंकार के काव्य में उत्कृष्टता नहीं आती। इसलिए काव्य में अलंकार परम आवश्यक हैं,जिससे किसी भी कवि का काव्य समाज में उन्नत स्थान प्राप्त करें और और सहृदयों को आनंद देने वाला हो।

 

 

 

Tropical scene

Comments

  1. यह ब्लॉग संस्कृतसाहित्य के विषय पर उपयोगी है, परंतु इस ब्लॉग में नवीनता हो तो और बढ़िया रहेगा।
    एकत्र करने का श्रम बढ़िया है।

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  2. अनेकों आचार्यों के मत एकत्र कर आपने यह विविध फूलों की सुन्दर क्यारी तैयार की है। 🙏

    शुभं भूयात्।।।

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  3. Is content se mujhe alankar k vishay me achchi jankari mili h. Thank you 🙏🏻🙏🏻

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  4. आचार्य श्री आप की इन पंक्तियों से हमें अलंकार के विषय में बहुत ही सरल तरीके से जानकारी प्राप्त हुई ।।
    ।।बहुत ही सुन्दर।।
    ।।धन्यवाद्।।
    🙏

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  5. बहुत ही अच्छे ढंग से विषय प्रस्तुत किया है
    जो आसानी से सभी के लिए उपयोगी होगा।

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  6. Very beautiful topic and great job 😻

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  7. संस्कृत साहित्य को समझने के लिए बड़े ही अच्छे ढ़ंग से लेख प्रस्तुत किया गया है।
    जो हम सब के लिए बहुत ही उपयोगी होगा।
    धन्यवाद 🙏

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  8. अलंकार के विषय में बहुत ही सहज और सुन्दर जानकारी प्राप्त हुई है।😊
    बहुत सुंदर कार्य 👌👌

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  9. आशा है कि ऐसे ही संस्कृत -साहित्य के क्षेत्र में आप नवीन संकलनों से छात्रों की सहायता और विषयों को रूचिपूर्ण बनाने में उनकी मदद करेंगे

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  10. बहुत बहुत सुंदर

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  11. वर्धतामभिवर्धताम्

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  12. बहुत उपयोगी जानकारी है।
    सुंदर 👍👍

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